ऋषिकेश,16फरवरी (AKA)। वर्ष 2021 में आयोजित होने वाले  महाकुंभ के दौरान देवप्रयाग ऋषिकेश व हरिद्वार में स्नानो को लेकर   फैलाई जा रही , भ्रम की स्थिति से कुहासे के बादलों को  हटाते हुए षड्दर्शन साधु समाज  के राष्ट्रीय अध्यक्ष  गोपाल गिरी ने कहा कि  कुंभ में स्थानों को लेकर भ्रम की स्थिति नहीं होनी चाहिए।  क्योंकि यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से  जुड़े कुंभ के दौरान स्नान होते हैं। रविवार को  षड्दर्शन साधु समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल गिरि ने  पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि महाकुंभ देश ही नहीं विश्व के करोडो लोगों की आस्था से जुड़ा महापर्व होता है। जिसके पीछे देवताओं और राक्षसों के बीच हुए विवाद के बाद समुद्र मंथन से निकले मानव जाति के कल्याण के लिए अमृत  का होना भी है। जिसे प्राप्त करने के लिए  देवताओं और राक्षसों के बीच हुई ,छीना झपटी के दौरान अमृत की छलकी संगम पर  बूंदों के गिरने पर कुम्भ पर्व के आयोजन से जुड़ा है। गोपाल गिरी का कहना है कि  जिसके बाद पहले कुम्भ उत्तरा खण्ड़ के प्रयागो मे ही आयोजित किया जाता था ।जिसमें देव प्रयाग मे अलकनंदा और भागीरथी का संगम होने के बाद वहां से बनी गंगा कहां होना है लेकिन देवप्रयाग में स्थान कम होने के कारण  दुर्घटना होने की संभावनाओं केे चलते,  ऋषिकेश के गंगा जमुना सरस्वती के संगम मे ऋषिभूमि कुब्जा मृर्ग तीर्थ मे महाराजा टिहरी नरेश ललीत शाह द्वारा कर दिया गया था। गोपााल गिरी का कहना हैै कि हरिद्वार मे अखाडे है ,लेकिन कोई संगम नहीं है, हरकी पैड़ी का निर्माण  मदन मोहन मालवीय द्वारा करवाया गया था। जो कि ब्रिटिश सरकार ने  सिचांई के लिए  बनाई गई गंग नहर है , यदि उसे गंगा मान लिया जाये। तो हरिद्वार  शहर नही रहेगा। उन्होंने  शहरी विकास मन्त्री  मदन कौशिक  के बयान की निंदा करते हुए कहा, कि हाल ही मेंं उत्तरा खण्ड़ उच्च न्यायलय के आदेश मेे जो कि जूना अखाड़े ने ही सूचना के अधिकार के तहत सिचाई विभाग से यह सूचना प्राप्त की है। , हरिद्वार मे अस्थी प्रवाह हेतु यह नहर को  चुना गया था। जहाँ की गंगा मे अस्थियों को डाले जाने को कहा है। इसलिये राजा मान सिहं की समाधि  जो गंगा मन्दिर है को चुना गया , और पण्ड़ा समाज वहाँ आज भी तर्पण करवाता है । उन्होंने कहा कि कुम्भ मेला  प्रशासन को भी इस मामले की अधिक जान कारी नही है ,रही जूना अखाड़े की बात वह भी उत्तरा खण्ड़ के कर्ण प्रयाग  मे स्थापित हुआ है , और उनका पहला
दायित्व है कि वह देव प्रयाग ,ऋषिकेश मे पहले स्नान करे ।और अपने साथ सभी अखाडो को भी स्नान करने के लिये आग्रह करे , परिषद के महामन्त्री  महन्त हरि गिरी  का भी ऋषिकेश मे स्थान है ,यहाँ भी जूना अखाड़ा  , महानिर्वाणी अखाडा  ,निरंंजनी अखाड़ा  ,आवाहान अखाडा ,उदसीन ,वैष्णव , बैरागी , सभी है , कुम्भ दशनाम गोस्वामी समाज का प्रमुख सम्मेलन है ,और समाज के मुखिया चुने जाने का समय होता है ,
कुम्भ जूना अखाड़े से ही जूडता है , यह सनः 547 ई. से आवाहान अखाडा ,सन् 647 से अटल अखाडा , 749 से महानिर्वाणी अखाडा , स्नान करते आ रहे है । जूना अखाड़ा सन् 1156 ई. मे बना ,और देव प्रयाग ,और ऋषिकेश मे स्नान के लिये श्री महन्त गोदावरी गिरी , व महन्त हरि गिरी  ने भी पहले भी यहीं पर स्नान के लिए मांग की थी। पर स्नान का प्रारम्भ  महन्त गोपाल गिरी  ने ही किया जिसके चलते 2004व  2010 मे देवप्रयाग  व ऋषिकेश में संतो द्वारा स्नान किया गया था। और नाथ संप्रदाय से जुड़े राकेश नाथ को कैंप लगाए जाने  के लिए जमीन का आवंटन भी ऋषिकेश में भरत बिहार में किया गया था। जहां उत्तराखंड की समस्त डोलियों का पड़ाव भी हुआ था। जिसे मध्य नजर रखते हुए स्नान को लेकर किसी को भी भ्रम फैलाने की आवश्यकता नहीं है । जिसमें शासन-प्रशासन व अखाड़ों को सहयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने देवप्रयाग व ऋषिकेश में स्नान किये जाने की स्वीकृति दिए जाने पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके द्वारा दो देवप्रयाग व ऋषिकेश प्रशासन को स्नान के लिए व्यवस्था बनाए जाने के निर्देश दिए हैं ,वह जनहित में है, उनका सम्मान होना चाहिए।

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