ऋषिकेश,23 अक्टूबर( AKA)।  एक 80 वर्षीय  संत द्वारा अपने अंतिम  समय को  ध्यान साधना भजन मे व्यतित करने के लिए अपने पैसे से बनाई गई, गंगा किनारे स्वर्ग आश्रम क्षेत्र में  कुटिया से आश्रम प्रबंधक द्वारा बेदखल कर दिए जाने के बाद अब रैन बसेरे के लिए भटकने को मजबूर होना पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि उम्र के जिस पड़ाव में आने पर परिवार और समाज के लोग आगे आकर सेवा भाव दिखाते हैं, ऐसे संत  शिवानंद आश्रम के  स्वामी चिदानंद सरस्वती के शिष्य 80 वर्षीय स्वामी दुर्गा नंद सरस्वती को जोंक के स्वर्गाश्रम प्रबंधन ने उनकी ही बनाई कुटिया से बेदखल कर दिया।  इस कुटिया का निर्माण इन्होंने अपने  पैसों से सात साल पहले किया था।  कुटिया बनाने की अनुमति स्वर्गाश्रम प्रबंधन से इस शर्त पर मिली थी, कि वो इस कुटिया में जीवन पर्यन्त रहेंगे ।और इनके शरीर छोड़ने के बाद ये कुटिया स्वर्गाश्रम प्रबंधन से दूसरे संत को साधना हेतु मिल जाएगी।
 स्वर्गाश्रम ट्रस्ट में संतो को योग, भजन, साधना आदि करने और जीवन यापन के लिए या तो खाली जमीन उपलब्ध करवाई जाती है ।
जिसकी 2010 मेंं स्वामी दुर्गानंद सरस्वती ने स्वर्गाश्रम प्रबंधन से अपने भजन और रहने के लिए उस समय के स्वर्गाश्रम के प्रबंधक सी पी शर्मा से अनुमति ली। फिर उन्होंने इनको भूमि उपलब्ध करवाई, जहां इनकी वर्तमान में कुटिया नंबर 25 है।
इतना सब खर्च करने के बावजूद भी वर्तमान स्वर्गाश्रम प्रबंधक ने फरवरी 2019 में इनको इनकी कुटिया से बाहर निकाल दिया। इस संबंध में स्वर्गाश्रम प्रबंधक कर्नल वी.के. श्रीवास्तव का कहना है ,कि सबसे पहले स्वामी  के शिष्य पर स्वर्गाश्रम की महिला कर्मचारी से अभद्रता करने की शिकायत आई। उसके बाद आसपास रहने वाले संतों ने इनके खिलाफ लिखित शिकायत भी दी। उसके बाद हमने ये कार्यवाही की।
वहीं इसी विषय मे स्वामी दुर्गानंद ने कहना है कि मैं कुंभ स्नान के लिए इलाहाबाद मेले और उसके बाद छत्तीसगढ़ तीर्थ में चला गया था। इस बीच मैं अपने शिष्य ब्रह्मचारी लक्ष्मण चेतन्य को स्वर्गाश्रम प्रबंधन से अनुमति लेकर ही दो माह के लिए अपनी कुटिया की सुरक्षा के लिए रखकर गया। इसी बीच शिष्य पर छेड़छाड़ के आरोप लग गए। जिसमें मुझे भी दोषी मानते हुए स्वर्गाश्रम प्रबंधन ने अपने दस से पंद्रह आदमियों के साथ मिलकर कुटिया से मेरा सामान बाहर निकाल दिया। इस पर जोंक थानाध्यक्ष राकेन्द्र सिंह कठैत का कहना है कि मैं तीन बार स्वर्गाश्रम प्रबंधन से मिला पर उन्होंने इसको अपना व्यक्तिगत मामला बताया।वहीं उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग ने भी इनके मामले को संज्ञान में ले लिया है।
इस मामले मे दूसरे कई संतों का कहना था कि स्वामी  दुर्गा नंद ने अपनी कुटिया का निर्माण खुद करवाया है।  जबकि प्रबंधक का  कहना था कि कुटिया का निर्माण हम करवाकर देते हैं। इसके अलावा प्रबंधन पर 30 साल के युवाओं को भी कुटिया देने का आरोप लगा है। जबकि इसमें उम्रदराज संतों को ही योग  साधना, भजन आदि करने के लिए कुटिया देने की व्यवस्था है।

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