ऋषिकेश, 12 सितंबर। बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान एवं ज्ञान यज्ञ परिवार के संयुक्त तत्वाधान मे आयोजित ज्ञानोत्सव 2019 के तेरहवें दिन के प्रथम सत्र की शुरूआत सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता भूपेंद्र सिंह की अध्यक्षता में हुई और जगतगुरू उत्तराखण्ड पीठाधीश्वर कृष्णाचार्य की  गरिमामय उपस्थिति में अध्यक्ष महोदय द्वारा ग्लोब पर मल्र्यापण के बाद विचार मंथन का विषय ’’वर्ण व्यवस्था’’ पर बोलते हुए प्रख्यात विचारक श्री बजरंग मुनि जी ने कहा कि यह निर्विवाद सत्य है कि भारत की अति प्राचीन सामाजिक व्यवस्था पूरी दुनियां की तुलना में अधिक विकसित तथा वैज्ञानिक थी। उस समय तो भारत वैज्ञानिक मामलों में भी दुनियां से ऊपर था और सामाजिक मामलांे में तो था ही। दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हंै,- सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्मपूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला-जुला प्रभाव व स्वरूप होता है। गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर यदि आकलन किया जाये तो चार अलग-अलग क्षमताओं के लोग मिलतेे हंै। इन चारों गुणों के कुछ अंश प्रत्येक व्यक्ति में जन्म से मृत्यु तक रहते हैं किन्तु चारों के कुछ अंश होते हुये भी प्रत्येक व्यक्ति में कुछ विशेष योग्यता भी होती है। इस विशेष योग्यता के आकलन के बाद ही इन्हें हम मार्गदर्शक, रक्षक, पालक और सेवक के रूप में विभाजित कर सकते हंै। इस विभाजन को ही प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था कहा जाता था। प्रत्येक बालक को बचपन में ही उसकी प्रवृत्ति का आकलन करके उसे सही दिशा में प्रशिक्षित किया जाता था और उसी योग्यतानुसार उन्हें का दायित्व भी दिया जाये।

द्वितीय सत्र के विषय ‘‘महिला सशक्तिकरण समस्या या समाधान‘‘ मुनि जी ने कहा कि किसी आधार पर होने वाला वर्ग निर्माण धूर्तता का सहायक होता है तथा शराफत को कमजोर करता है। धूर्त व अपराधियों की यह चालाकी हजारांे वर्षांे से चली आ रही है और आज तो वर्ग निर्माण और भी तीव्र गति से बढ़ रहा है भले ही इसका स्वरूप कुछ बदल गया हो। इस प्रकार से, वर्ग-निर्माण के उपक्रम में आज बने हुये कई वर्गों में से एक वर्ग है ’महिला-पुरूष’। उन्होंने एक सामाजिक अभिभावक की तरह समझाते हुये कहा कि महिलाओं को यह आभास कराया जाना चाहिये कि यदि पति-पत्नी के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी होगी तो वह महिलाओं के लिए भी हानिकारक होगी क्योंकि महिला और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि हम ये बातें समझाने में सफल हो गये तो महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाले स्वार्थी तत्व अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएंगे। राजनैतिक नेता अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये महिला सशक्तिकरण के नारे को हथियार के रूप में उपयोग कर रहे हैं। यह नारा परिवार और समाज व्यवस्था के लिये बहुत घातक है। ऐसे नारे का पूरी तरह विरोध होना चाहिये।
ज्ञानोत्सव के कार्यक्रम में पहुचे वरिष्ठ अधिवक्ता भूपेंद्र सिंह ने कहा कि प्राचीन वैदिक परम्परा में वर्ण व्यवस्था समाज में एक संतुलित ऐसी व्यवस्था थी कि वो एक-दूसरे हितैषी व सहयोगी थे। जिस प्रकार हमारे शरीर को चार अंग है- मस्तक, छाती, पेट और पैर उसी प्रकार वर्ण व्यवस्था बनी थी। एक-दूसरे के बिना शरीर कुछ नहीं कर सकता। आज सामाजिक व्यवस्था बिगड़ गयी है। हमलोगों को फिर से आगे आना होगा।
ज्ञानोत्सव के कार्यक्रम में प्रमुख रूप डॉ राजे नेगी,पुष्पा ध्यानी,पिंकी कंडवाल,राजीव थापलियाल, संजय तांती, बच्चू सिंह, भरत लाल, डाॅ0 विजय शंकर शुल्क, धर्मवीर सिंह, इन्द्रपाल सिंह यादव, प्रेमनाथ गुप्ता, हाकिम सिंह, धर्मवीर सिंह, रमेश शर्मा, प्रेमपाल सिंह, सन्दीप मित्तल, सुरेश शर्मा, राणा प्रताप सिंह, विपीनानंद, अशोक गुप्ता, अंबरीश यादव, प्रेमलता देवी, आचार्य दिग्विजय सिंह, सुरेन्द्र सिंह, सत्येन्द्र यादव, अजय शुक्ल बाबा, नितिन त्रिवेदी, अनुराग कौशिक, चंद्र मोहन पाण्डेय, दीपक जयसवाल एवं अन्य प्रतिभागी उपस्थित रहे।

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