ऋषिकेश। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश में पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के चिकित्सकों ने एक साढ़े पांच साल के बच्चे की आहार नलिका में फंसे 10 रुपए के सिक्के को सफलतापूर्वक बाहर निकालकर उसे बचा लिया। एम्स निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत ने बताया कि उत्तराखंड में इस तरह के केस से जुड़े उपकरण व विशेषज्ञ चिकित्सक गिने -चुने व निजी संस्थानों में ही उपलब्ध हैं। उन्होंने अभिभावकों को छोटे बच्चों को ऐसी घटनाओं से बचाने के लिए सजग रहने की जरुरत बताई। उन्होंने बताया कि कईदफा अभिभावकों की छोटी सी लापरवाही बच्चों के जीवन पर भारी पड़ जाती है।               ज्वालापुर, हरिद्वार निवासी एक साढ़े पांच साल के बच्चे ने खेलते समय 10 रुपए का सिक्का निगल लिया। जो उसकी आहार नाल में जाकर फंस गया। इसके बाद बच्चे को बेचैनी होने लगी और वह रोने लगा। परिजनों ने सूझबूझ का परिचय देते हुए उसे करीब ढाई घंटे के अंतराल में एम्स ऋषिकेश की ट्रॉमा इमरजेंसी में भर्ती कराया। संस्थान के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग की टीम ने एनेस्थिसिया टीम की सहायता से ऑपरेशन थियेटर में फोलिस कैथेटर (गुब्बारे से युक्त रबड़ के पाइप के उपकरण) की सहायता से बच्चे की आहार नाल में फंसे 10 रुपए के सिक्के को सफलतापूर्वक बाहर निकाल लिया। एम्स निदेशक पद्मश्री प्रो. रवि कांत ने इस सफलतापूर्ण कार्य के लिए बाल शल्य चिकित्सा विभाग की टीम के प्रयासों की सराहना की है। उन्होंने बताया कि आमतौर पर अभिभावक बच्चों के प्रति लापरवाही बरतते हैं और उन्हें सिक्के, कांच की गोली, मूंगफली, काजू जैसी चीजें दे देते हैं, ऐसे में यह वस्तुएं सांस की नली में फंस सकती हैं, जिसके परिणाम घातक व जानलेवा साबित हो सकते हैं। लिहाजा ऐसे मामलों में खासकर अत्यधिक छोटे बच्चों के प्रति लोगों को जागरुक रहने की आवश्यकता है। वजह इस तरह की घटनाएं छोटे बच्चों को बचाने के लिए ज्यादा वक्त नहीं देती। एम्स निदेशक पद्मश्री प्रो. रवि कांत ने बताया कि इस तरह के मामलों में संस्थान में जटिल सर्जरी की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग की डा. इनोनो यहोशु व डा. मनीष कुमार गुप्ता ने बताया कि फोलिस कैथेटर (एक सिरे पर गुब्बारा लगे रबड़ के पाइप के उपकरण) को बच्चे की नाक के रास्ते आहार नाल में फंसे सिक्के के नीचे तक डाला गया, इसके बाद सीरिंज के जरिए पाइप में पानी भरकर गुब्बारे को फुलाया गया, जिसके बाद पाइप को धीरे- धीरे ऊपर खींचकर सिक्के के साथ बाहर निकाला गया। उन्होंने बताया कि इस कार्य में पीड़ित बच्चे ने चिकित्सकीय टीम की सहायता की अन्यथा बच्चे को बेहोशी देकर दूरबीन विधि से सिक्के को निकालना पड़ता। उन्होंने बताया कि अक्सर इस तरह की लापरवाही के चलते सेफ्टी पिन, कील, कांच आदि के गले में जाने से आहार नली फट सकती है अथवा यह वस्तुएं एक स्थान से दूसरे स्थान पर अटक सकती हैं,जिससे परिणाम घातक हो सकते हैं। टीम में बाल शल्य चिकित्सा विभाग के डा. ज्ञानेंद्र, डा. नताशा, एनेस्थिसिया विभागाध्यक्ष डा. संजय अग्रवाल, डा. सीतू चौधरी, डा. देविथा आदि शामिल थे।

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