ऋषिकेश। देहरादून रोड़, ऋषिकेश स्थित ’बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान’ द्वारा आयोजित होने वाले साप्ताहिक ज्ञान-यज्ञ कार्यक्रम में देश के प्रख्यात विचारक श्री बजरंग मुनि जी ने आज के विषय ’समाजशास्त्र’ पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि एक समय था जब भारत विचारों का निर्यात करता था, जबकि आज स्थिति इसके विपरीत है। सदियों की गुलामी ने भारतीय समाज व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। इसाईयत, इस्लाम और साम्यवादी विचारधारा ने समाज के मौलिक स्वरूप को बदलकर रख दिया है। एक तरफ भौतिक उन्नति लगातार हो रही है दूसरी तरफ चरित्र पतन उतनी ही तेज गति से हो रहा है। शिक्षा बढ रही है और ज्ञान घट रहा है। जहां धर्म व राज्य समाज व्यवस्था के सहायक होने चाहिये, अब ये समाज नियंत्रक की भूमिका में है। मानव स्वभाव में ताप वृद्धि व स्वार्थवृत्ति वृद्धि इसी का परिणाम है। पाश्चात्य संस्कृति ने धन को आधार बनाया, इस्लाम संस्कृति ने धर्म को और साम्यवाद ने राज्य को ही सर्वश्रेष्ठ मान लिया। और धीरे-धीरे समाज का स्थान गौण हो गया। जहां समाज विश्व के समस्त मानव जाति का वृहत्तम समूह है, वहीं इन संस्कृतियों ने और खासकर राजनीति ने समाज को टुकडों-टुकडों में बांट दिया। वर्ग संघर्ष इसी वर्ग निर्माण का परिणाम है। वर्ग समन्वय की दिशा में कोई आगे बढने को तैयार नहीं। अपना समाज जो परस्परावलम्बन व सहजीवन पर आधारित समाज था, आज पाश्चात्य व्यवस्था का अनुकरण कर व्यक्ति-व्यक्ति में बंटता गया है। समाज की मूल इकाई परिवार को तो संविधान से ही इन धूर्त राजनेताओं ने बाहर कर दिया है। आर्थिक उन्नति के लिये सारी विद्यायें व विधायें सिखाई जा रही है लेकिन ’समाजशास्त्र’ पर कोई चर्चा नहीं करता। आज जरूरत है ’वर्तमान समाज व समाजशास्त्र’ पर गंभीर विचार-मंथन की, तभी व्यवस्था में बदलाव संभव है। समाज व्यवस्था के टूट जाने से समाज की गलत परिभाषायें बन गई और राष्ट्र समाज से बड़ा बन बैठा है। पुनः मुनि जी ने बहुत आत्मविश्वास पूर्वक बताया कि आज ऐसा कोई नेता या धर्म नेता नहीं जो समाज को सर्वोच्च बतायें, कोई राष्ट्र को बड़ा बतायेगा तो कोई धर्म को।
इस अवसर पर संस्थान के निदेशक ने रामानन्द, माधवाचार्य आदि विद्वानों के उदाहरण देते हुये कहा कि स्वयं विकसित दीर्घकालिक नियम पालन से प्रतिबद्ध व्यक्तियों के समूह को समाज कहते है। प्राचीनकाल से ही समाज को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था और परिवार, गांव व राज्य समाज व्यवस्था के सफल संचालन के लिये सहायक इकाई। प्राचीनकाल में समाज व्यवस्था को बनाये रखने हेतु निरन्तर चिन्तन-मनन के आयोजन भी हुआ करते थे। खुले हृदय से शास्त्रार्थ का आयोजन होता था। ऋग्वैदिक ऋचाओं से भी इसकी पुष्टि होती है कि समाज सर्वोच्च है।
इस साप्ताहिक ज्ञान-यज्ञ कार्यक्रम में श्री प्रमोद कुमार वात्सल्य जी, राजेन्द्र प्रसाद, देवेन्द्र प्रसाद, शैंकी सेमवाल, विरेन्द्र नौटियाल, सुरेन्द्र स्वरूप, आशीष कुमार, शुभेन्दु महापात्र, मुकेश ग्रोवर, विनोद जुगलान, सौरभ शर्मा, आचार्य रामकृष्ण पोखरियाल, उत्तम सिंह असवाल, ज्ञान यज्ञ के संयोजक अभ्युदय भाई, नवीन कुमार शर्मा, संजय ताॅती, अनोखे लाल यादव, विपिन तिवारी व अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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