पं- जयप्रकाश शर्मा का जन्म 12 अगस्त 1919 को ग्राम भलस्वागाज, डाकखाना रूड़की जिला सहारनपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री पंडित रामचन्द्र शर्मा व माता का नाम श्रीमती गणपति देवी था। उनके पिता मैट्रिक पास थे व जंगलात विभाग में रेंजर पद पर कार्यरत थे, परन्तु माता अशिक्षित थी। पिता तो प्रगतिशील विचारों के थे परन्तु माता रुढि़वादी थी। जयप्रकाश शर्मा ने उर्दू, हिन्दी व अंग्रेजी में भलस्वागाज व बाद में कैलाशपुर से इण्टर किया।
सन् 1930 में गांधी इरविन पैक्ट के आन्दोलन से सर्वप्रथम प्रभावित हुआ था। तत्पश्चात छिटपुट क्रांतिकारी आन्दोलन में हिस्सा लेने लगा। सन् 1932 में पहली बार पकड़ा गया, किन्तु साक्ष्य न होने के कारण तुरन्त छोड़ दिया गया। बड़े भाई श्री बाबूराम शर्मा जी स्वतं=ता आन्दोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे और वे दो बार जेल भी भेजे गये।
घर के बुजुर्गों की असमय मृत्यु हो जाने के कारण ताई जी व माता जी आन्दोलनों में भाग लेने का विरोध करती थी। पारिवारिक आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ नहीं थी। जयप्रकाश शर्मा व उनके बड़े भाई के आन्दोलन में भाग लेने से व बड़े भाई के जेल चले जाने के कारण आर्थिक कष्ट बढ़ गया था। पैतृक भूमि समाप्त हो गई थी व कारोबार नष्ट हो चुका था। अन्य भाई छोटे थे और आर्थिक मदद देने में असमर्थ थे। बहन कमला के विवाह हेतु परिवारजनों को कर्ज लेना पड़ा जो की वर्षों पश्चात ही चुकाया जा सका।
पं- जयप्रकाश ने भारत छोड़ो आन्दोलन में खुलेरुप से हिस्सा लिया था व जेल भी गया। अंग्रेजी शासन के विरुद्व जुलूसों, सभाओं व प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया करता था। वे भारत छोड़ों आन्दोलन में क्रांतिकारी कार्यों में हिस्सा लेते थे। रोहाना (जिला मुजफ्रफरनगर) रेलवे स्टेशन को उनके नेतृत्व में तोड़ा-फोड़ा गया व उसे लूटा भी गया था। सहारनपुर से दिल्ली को जो छोटी रेलवे लाइन जाती थी, उस पर शामली के पास ननौता रेलवे स्टेशन को लूटने की योजना उनके द्वारा ही बनाई थी, लेकिन पुलिस से मुठभेड़ हो जाने के कारण और रेलवे मास्टर की उनके हाथों मृत्यु हो जाने के कारण लूट की योजना पूर्ण न हो सकी। इस घटना में पं- जी के दाहिने पैर में पुलिस की गोली भी लगी, परन्तु वे भागने में सफल रहे। इस काण्ड में उनके ऊपर मुकदमा भी चला, लेकिन शिनाख्त में पहचान न होने के कारण बरी कर दिये गये थे।
क्रांतिकारी आन्दोलन को चलाने के लिए सबसे अधिक रुपयों व हथियारों की आवश्यकता थी। अतः धन व हथियारों की जरुरत को पूरा करने के लिए ग्राम कैड़ी जिला मुजफ्रफरनगर में बनियों के यहां डकैती डाली जो सफल रही। इस डकैती में भी पं-जी के ऊपर मुकदमा चला, किन्तु साक्ष्य के अभाव में छूट गये।
पं- जी के साथ चौ0 रतन सिंह, ग्राम नांगल, जिला सहारनपुर, श्री हरबंश सिंह त्यागी ग्राम नावला, जिला मुजफ्रफरनगर, श्री हरिराम शर्मा, तत्कालीन वैतनिक सचिव, कांग्रेस सहारनपुर, श्री जगदीश नारायण सिन्हा, रुड़की जिला सहारनपुर आदि साथ थे।
विभिन्न आन्दोलनों एवं कान्डों में, पं- जयप्रकाश शर्मा को लगभग तीन वर्ष चार माह तक नजर बन्द रखा गया। उस समय जेल में राजनैतिक कैदियों के साथ काफी सख्ती बरती जाती थी। वे तीनों श्रेणियों की जेल में रहे लेकिन अधिकांशतः प्रथम व द्वितीय श्रेणी में रहे। केन्द्रीय कारागारों में भोजन की व्यवस्था ठीक थी लेकिन सख्ती वहाँ भी बरती जाती थी। एक बार बरेली सेन्ट्रल जेल में अंग्रेज अधिकारी कनैल लाई ने लाठीचार्ज कराया था जिससे बहुत लोग घायल हुए थे। उस समय पं0 जवाहर लाल नेहरु भी बरेली जेल में थे।
उस वसमय जेलों में ‘सी’ श्रेणी के कैदियों को अन्य अपराधियों के समान भोजन (रोटी, दाल, सब्जी) इत्यादि मिलता था किन्तु अन्य कोई अतिरिक्त सुविधाा प्राप्त नहीं थी। जबकि ‘बी’ व ‘ए’ श्रेणी के कैदियों को अच्छा भोजन व साथ में दूध व फल भी मिलते थे। ‘ए’ श्रेणी के कैदियों के लिए उनकी रुचि के अनुसार सामिष अथवा निरामिष भोजन मिलता था। नाई इत्यादि की अतिरिक्त सुविधाा भी इन्हें प्राप्त थी।
उस समय जेल में प्रारम्भ से समाचार-पत्र इत्यादि की कोई सुविधा नहीं थी। लेकिन एक वर्ष पश्चात समाचार पत्र पढ़ने के लिए दिया जाने लगा। जेल के पुस्तकालय से पुस्तकें व पत्रिकाएं पढ़ने के लिए मिल जाती थी। जेल में नजरबन्द होने के कारण परिवारजनों से मिलने की इजाजत नहीं थी। सिर्फ एक बार उन्हें उनके चाचाजी से मिलने दिया गया। (विशेष परिस्थिति में)।
उनके साथ बरेली जेल में पं0 जवाहर लाल नेहरु, श्री बनारसी दास गुप्ता, श्री अब्दुल सत्तार खैरी, श्री गणेश शंकर विद्यार्थी, नौरंगी लाल भारती, उमराव सिंह चौहान, सी0पी0 शर्मा, बद्रीदत्त पाण्डेय व मेरठ जेल में चौ0 रतन सिंह, परिपूर्णानन्द पैन्यूली, हरीराम शर्मा, जगदीश नारायण सिन्हा, ईश्वरी सिंह, गौरी शंकर शर्मा, प्रो0 धर्मवीर त्यागी इत्यादि साथी बन्दी थे।
नजरबन्द होने के कारण दिनचर्या में केवल पुस्तकें आदि पढ़ने व अपने क्रान्तिकारी गीत गुनगुनाने में ही समय व्यतीत होता था। कभी-कभी अपने साथियों के साथ विभिन्न विषयों पर चर्चायें कर लेते थे और कोई विशेष दिनचर्या नहीं थी।
जेल के दिनों में हमारे प्रिय क्रान्तिकारी गीत निम्नलिखित थे -
वन्दे मातरम् ,  वन्दे मातरम् , वन्दे मातरम्

नहीं रखनी सरकार जालिमों वाली

दुनिया में जीने का सुन्दर मधाुर तकाजा
उठते वे वीर अपना फ़ूलों भरा जनाजा

ओह भगत सिंह के गम में अभी दिल नासाद है
उसकी गर्दन में डाला फंदा तो भी दिन याद है

तीनों कांकों में गिरते हुए को थामने,
किसके तुम लाये ये सर, शाह-ए-जफर के सामने।

लूट लो बरबाद कर दो आशियाँ सौपा का

ये काने, सीमाओं जर का जिक्र भी सुनहरा है।
ये सरकारी खजाने जिन पर संगीनों का पहरा है।
ये मेरे अज में बगावत की आमाज गाहे हैं। इत्यादि
देश आजाद होने की बात सुनकर पहिले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। अपनी कोशिशों को सफल होते देखकर बाद में बहुत खुशी हुई।। परन्तु आजादी के बाद की परिस्थितियों से वे पूर्णतः सन्तुष्ट नहीं थे और उनका झुकाव साम्यवादी  आन्दोलन की ओर हुआ, जिसके कारण वे अपने मंझले पुत्र विनय कुमार मनमीत के साथ जेल भी गये।
जब देश का बंटवारा होने की खबर सुनी तो एकदम धक्का सा लगा और अफसोस भी बहुत हुआ। वे कहते थे कि ये आजादी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी हमें जिसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। देश के विभाजन के पश्चात आने वाले शरणार्थियों की नित्य की आवश्यकताओं हेतु जनता से धन एकत्र कर उनको शिविरों में पहुंचाया गया। शरणार्थियों को शहर में स्थापित होने में हरसम्भव सहायता पहुँचाई। ऋषिकेश में उन्होंने मीरा बहन के साथ मिलकर एक पूरे गाँव को को-ऑपरेटिव ढंग से स्थापित किया। उस ग्राम की अध्यक्षा मीरा बहन थी व उन्हें सचिव का काम सौंपा गया। उस ग्राम का नाम बापूग्राम है जो वीरभद्र, आई-डी-पी-एल- के समीप स्थित है।

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